कहानी बैजनाथ ज्योर्तिलिंग स्थापना की: Baba Baidyanath Dham Deoghar Temple History in...

कहानी बैजनाथ ज्योर्तिलिंग स्थापना की: Baba Baidyanath Dham Deoghar Temple History in Hindi

668
0
SHARE
Baba Baidyanath Dham

Baba Baidyanath Dham Deoghar Temple History, Story in Hindi: बैद्यनाथ मंदिर (Baba Baidyanath Temple) बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र वैद्यनाथ शिवलिंग झारखंड के देवघर (Baba Baidyanath Dham Deoghar) में स्थित है. श्री वैद्यनाथ (Baidyanath) शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। कहा जाता है सावन में जो भक्त भोलेनाथ को जल चढाने यहां आता उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है. इसलिए इस शिवलिंग को ‘कामना लिंग’ भी कहते हैं.

बैद्यनाथ मंदिर का इतिहास: Baba Baidyanath Dham Deoghar Temple History in Hindi

12 ज्योतिर्लिंगों के लिए कहा जाता है कि जहां-जहां महादेव साक्षत प्रकट हुए वहां ये स्थापित की गईं. इसी तरह पुराणों में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (Baidyanath Jyotirlinga) की भी कथा है जो लंकापति रावण से जुड़ी है.

मंदिर की स्थापना वर्ष 1596 में की गई। खोया हुआ शिवलिंग बैजू नाम के एक आदमी को मिला था और उसके बाद इसका नाम बैद्यनाथ मंदिर (Baba Baidyanath Temple) रखा गया। पुराणों और ग्रंथो में भी बैद्यनाथ (Baidyanath) को महत्व दिया गया है। यह एक शक्तिपीठ भी है। नौलखा मंदिर भी नजदीक ही स्थित है।
प्रतेक साल सावन में यहा मेला आयोजित किया जाता है तथा हजारों श्रद्धालु इस 30 दिवसीय महोत्सव के दौरान मंदिर की यात्रा करते हैं। सोमवार को भोलेनाथ को जल चढाने से बहुत महत्वा होता है इस लिए सावन के सोमवार को यह ज्यादा भीड़ लगता है।

Also Read: नवरात्र में सासाराम के इस माँ ताराचण्डी मंदिर में लगती है भक्तों की भीड़
अगर आप दर्शन के यहाँ आते है तो इस स्थान के आस-पास छोटी-मोटी दुकानें व भोजनालय, जो विभिन्न व्यंजन एवं स्थानीय मिठाई पेड़ा बेचते हैं, पर्यटकों के यहां भ्रमण हेतु एक प्रमुख आकृषण है। मंदिर सुबह को 4 बजे खुलता है तथा रात में 9 बजे बंद होता है।

बाबा बैजनाथ धाम की कथा: Baba Baidyanath Dham Deoghar Temple Story in Hindi

रावण भगवान शिव का परम भक्त था। वह भगवान भोलेनाथ को अपनी भक्ति की सीमा में बांधकर रखना चाहता था। इसके लिए रावण ने कई उपाय किए पर भगवान भोलेनाथ भला एक के होकर कैसे रह सकते थे इसलिए रावण का हर दांव खाली गया।
जब रावण निराश होकर अपने सिर की बलि चढ़ाने लगा तो शिव प्रकट हुए और रावण के साथ लंका जाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन शर्त रख दी कि मैं तुम्हारे साथ लिंग रूप में चलूंगा। यह लिंग तुम जहां रख दोगे मैं वहीं पर विराजमान हो जाउंगा।

रावण को अपने बाहु बल का बड़ा अभिमान था उसने सोचा कि शिवलिंग कितना भारी होगा इसे उठाकर में सीधा लंका ले जाऊंगा, यही सोचकर इसने शिव जी की शर्त तुरंत  से मान लिया।

इस पुरे खेल को भगवान विष्णु जी देख रहे थे।  विष्णु जी ने देखा कि रावण शिव जी को लेकर लंका जा रहा है तो उन्हें जगत की चिंता सताने लगी। भगवान विष्णु बालक के रूप में रावण के सामने प्रकट हो गए। इसी समय रावण को लघु शंका लगी और उसने बालक बने विष्णु से अनुरोध किया कि शिवलिंग को अपने हाथों में थाम कर रखे, जब तक कि वह लघु शंका करके आता है।

Also Read: मणिकर्णिका घाट पर स्थित बाबा महाश्मशान नाथ मंदिर में खेली गई चीता भस्म की होली

रावण के पेट में गंगा समा गयी थी इसलिए वह लंबे समय तक मूत्र विसर्जन करता रहा। इसी बीच बालक बने विष्णु ने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। रावण जब मूत्र त्याग करने के बाद लौटा तो भूमि पर रखे शिवलिंग को देखकर बालक पर बहुत क्रोधित हुआ। लेकिन वह कर भी क्या सकता था।

रावण ने शिवलिंग को उखाड़ने का पूरा प्रयास किया लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। क्रोध में भरकर रावण ने शिवलिंग के पैर पर एक लात मारी जिससे शिवलिंग भूमि में धंस। यह शिवलिंग झारखंड में स्थित बाबा बैद्यनाथ (Baba Baidyanath) हैं। ऐसे ही एक कथा गुप्ता धाम बाबा की जो भस्मासुर के डर से छुप गए थे भगवान शिव

मंदिर के पास एक तालाब है जिसमें तीर्थयात्री स्नान करके बाबा को जल चढ़ाते हैं। इसी तालाब के पास दूसरा तालाब है जिसमें कोई स्नान या आचमन नहीं करता है क्योंकि इसे रावण के मूत्र से बना तालाब माना जाता है।

बैद्यनाथ धाम पवित्र यात्रा: Baba Baidyanath Dham Yatra

बैद्यनाथ धाम (Baba Baidyanath Dham) की पवित्र यात्रा श्रावण मास (July-August) में शुरु होती है। सबसे पहले तीर्थ यात्री सुल्तानगंज में एकत्र होते हैं जहाँ वे अपने-अपने पात्रों में पवित्र गंगाजल भरते हैं। इसके बाद वे गंगाजल को अपनी-अपनी काँवर में रखकर बैद्यनाथ धाम (Baba Baidyanath Dham) और बासुकीनाथ की ओर बढ़ते हैं। पवित्र जल लेकर जाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह पात्र जिसमें जल है, वह कहीं भी भूमि से न सटे।

वैद्यनाथधाम में महाशिवरात्रि व पंचशूल की पूजा



यहाँ प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि से 2 दिनों पूर्व बाबा मंदिर, माँ पार्वती व लक्ष्मी-नारायण के मंदिरों से पंचशूल उतारे जाते हैं। इस दौरान पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। जैसा कि नीचे के चित्रों में आपको दिखाई पड़ेगा। वैद्यनाथ धाम (Baba Baidyanath Dham) परिसर में स्थित अन्य मंदिरों के शीर्ष पर स्थित पंचशूलों को महाशिवरात्रि के कुछ दिनों पूर्व ही उतार लिया जाता है। सभी पंचशूलों को नीचे लाकर महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व विशेष रूप से उनकी पूजा की जाती है और तब सभी पंचशूलों को मंदिरों पर यथा स्थान स्थापित कर दिया जाता है। इस दौरान बाबा बैद्यनाथ (Baba Baidyanath) व पार्वती मंदिरों के गठबंधन को हटा दिया जाता है। महाशिवरात्रि के दिन नया गठबंधन किया जाता है। गठबंधन के लाल पवित्र कपड़े को प्राप्त करने के लिए भी भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। महाशिवरात्रि के दौरान बहुत-से श्रद्धालु सुल्तानगंज से कांवर में गंगाजल भरकर 105 किलोमीटर पैदल चलकर और ‘बोल बम’ का जयघोष करते हुए वैद्यनाथधाम पहुंचते हैं।

ये भी खबर पढ़े

loading...